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14/09/2011


हर तरफ़ फ़ूल हों, खुश्बुओं का अहसास
उमंगें ही उमंगें हो न कहीं संत्रास
हर रिश्ते में घुली हो जीवन की मिठास
जीतें हम विश्वास को, दें सबको विश्वास
मिले सबको खुशियां. पूरी हों हर आशा
प्रेम के दिन गढें प्रेम की नई परिभाषा
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नहीं कोई यार आप सा, जानते हैं अच्छी तरह
मांगते हैं आपको खुदा से रोज़ दुआ की तरह
हसरत यही कि जब तक रहे जान में जान
आप हमारे ही रहें हमारे साए की तरह
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सूरज तो रोज़ ही आता, चला जाता है जलाकर
ये छांव ही है किसी की जो रखती है हमें बचाकर
ले जाता रोज माली तोडकर न जाने कितने फ़ूल बगीचे से
फ़िर भी खिलते ही हैं फ़ूल, वही ताज़गी और खुश्बू लेकर
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इससे पहले कि आंखों के मोती, किरकिर हो जाए
इससे पहले कि सपनों के महल, खण्डहर हो जाए
हम टटोल लें अपनी अपनी ज़मीं आसमां
जाने कब यह अब्र सा दिन, कब्र सी सहर हो जाए


कितने हीं जवाब दूं तुम्हारे सवाल खतम न होंगे
कितना ही हिसाब दूं तुमको हज़म न होंगे
रिश्ता  कुछ ऎसा ही  हो गया है हमारा
चाहे जितना पास हों, फ़ासले कम न होंगे
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