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20/02/2013

देखा है.... पुजते मंजिलों को


न जाने किस किस आंख के घेरे में हूं
हर वक्त किसी न किसी पहरे में हूं
सबको दिखायी देती है मेरी चमक
जानता हूं, कितने अंधेरे में हूं
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वो महलों के झरोखे में खड़े हैं
उन्हें महलों पहुंचाने वाले रास्ते बेज़ुबान पड़े हैं
उग आयी हैं झाड़ियां उन मज़ारों पर भी
जो महलों की हिफ़ाज़त में बेमौत मरे हैं
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देखा है....
पुजते मंजिलों को
रास्तों की कभी
जयकार नहीं देखी
क्या हुआ जो नहीं पहुंचे वहां तक
हौसलों की कभी
हार नहीं देखी
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नहीं जानता स्त्रियां रोती क्यूं रहती है
बात बात आंखें भिगोती क्यूं रहती है
लड़ती क्यूं नहीं लड़ाइयां अपने हक की 
आंसूओं में खुद को डूबोती क्यूं रहती है
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उसकी हर बात अदा लगने लगी
वो मुमताज, अनारकली, नूरजहां लगने लगी
यकबयक बचपने से बालिग हो गए
इश्क हुआ तो यार! हम भी गालिब हो गए
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