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20/02/2013

देखा है.... पुजते मंजिलों को


न जाने किस किस आंख के घेरे में हूं
हर वक्त किसी न किसी पहरे में हूं
सबको दिखायी देती है मेरी चमक
जानता हूं, कितने अंधेरे में हूं
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वो महलों के झरोखे में खड़े हैं
उन्हें महलों पहुंचाने वाले रास्ते बेज़ुबान पड़े हैं
उग आयी हैं झाड़ियां उन मज़ारों पर भी
जो महलों की हिफ़ाज़त में बेमौत मरे हैं
*******



देखा है....
पुजते मंजिलों को
रास्तों की कभी
जयकार नहीं देखी
क्या हुआ जो नहीं पहुंचे वहां तक
हौसलों की कभी
हार नहीं देखी
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नहीं जानता स्त्रियां रोती क्यूं रहती है
बात बात आंखें भिगोती क्यूं रहती है
लड़ती क्यूं नहीं लड़ाइयां अपने हक की 
आंसूओं में खुद को डूबोती क्यूं रहती है
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उसकी हर बात अदा लगने लगी
वो मुमताज, अनारकली, नूरजहां लगने लगी
यकबयक बचपने से बालिग हो गए
इश्क हुआ तो यार! हम भी गालिब हो गए
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27/01/2012

क्या कहें कैसे हैं हम


तुम्हारे हर सवाल का जवाब हूं मैं
तुम्हें किस किस पल का हिसाब दूं मैं
तुम्हारा हर अफ़साना दर्ज़ है मुझ में
दिल से पढो, तुम्हारी ही किताब हूं मैं
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जाने कितने क्या इल्ज़ाम लगाए उसने
एक-एक गिन-गिन कर सुनाए उसने
मोहब्बत का कत्ल करने मोहब्बत से
दिल पर नश्तर ही नश्तर चुभाए उसने
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हवाएं कब किसकी हुयी है
बहुत ही चंचला, छुईमुई है
हवाओं को बांधने की कोशिश में
कितनों की ही हवा निकल गयी है
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क्या कहें कैसे हैं हम
जैसे थे वैसे हैं हम
उड़ो तो आकाश
डूबो तो सागर हैं हम
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जानता हूं नहीं बुलाओगे, फ़िर भी मैं आऊंगा
तुम्हारी हर जली-कटी, सुनता चला जाऊंगा
तुम इंतज़ार ही करते रह जाओगे मेरे रोने का
फ़िर भी मैं, मुस्कराए चला जाऊंगा





14/09/2011


हर तरफ़ फ़ूल हों, खुश्बुओं का अहसास
उमंगें ही उमंगें हो न कहीं संत्रास
हर रिश्ते में घुली हो जीवन की मिठास
जीतें हम विश्वास को, दें सबको विश्वास
मिले सबको खुशियां. पूरी हों हर आशा
प्रेम के दिन गढें प्रेम की नई परिभाषा
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नहीं कोई यार आप सा, जानते हैं अच्छी तरह
मांगते हैं आपको खुदा से रोज़ दुआ की तरह
हसरत यही कि जब तक रहे जान में जान
आप हमारे ही रहें हमारे साए की तरह
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सूरज तो रोज़ ही आता, चला जाता है जलाकर
ये छांव ही है किसी की जो रखती है हमें बचाकर
ले जाता रोज माली तोडकर न जाने कितने फ़ूल बगीचे से
फ़िर भी खिलते ही हैं फ़ूल, वही ताज़गी और खुश्बू लेकर
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इससे पहले कि आंखों के मोती, किरकिर हो जाए
इससे पहले कि सपनों के महल, खण्डहर हो जाए
हम टटोल लें अपनी अपनी ज़मीं आसमां
जाने कब यह अब्र सा दिन, कब्र सी सहर हो जाए


कितने हीं जवाब दूं तुम्हारे सवाल खतम न होंगे
कितना ही हिसाब दूं तुमको हज़म न होंगे
रिश्ता  कुछ ऎसा ही  हो गया है हमारा
चाहे जितना पास हों, फ़ासले कम न होंगे
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18/05/2011


उदासियों के भार ढोने नहीं देती
आंखें मेरी मुझको, रोने नहीं देती
आते हैं जाने कितने ही तूफ़ां
हौसला ओ जिद कश्ती डूबोने नहीं देती
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हर वक्त किसी न किसी जोड-तोड, जुगाड में रहते हैं
किसी को थापने और किसी को उखाड में रहते हैं
सब कायल हैं उनकी काबलियत के यारों!
किसी सरकार के नहीं हैं, पर सरकार में रहते हैं
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कितने खुशकिस्मतों को नसीब है हंसी
जाने कितनों की जान, कहां कहां फ़ंसी
नसीबों की बात, किसी को आती नहीं हंसी 
किसी की रुकती नहीं हंसी
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हौसलों के हमने अपने पर जो फ़डफ़डाए,
आसमां से भी आगे कई आसमां नजर आए
जितना आजमाना है आजमाले ऎ तकदीर
डर है हमारे हौसलों से, कहीं तू ही न डर जाए
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किसी को हमारी याद आती नहीं
किसी की याद हम से जाती नहीं
कुछ ऎसी ही खामख्वाह वजहों की वजह से
नींद रात भर आती नहीं
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न जाने उनके कितने झूठ पकडे जाते रहे
फ़िर भी वे सच का झंडा लिए मंचों की शोभा बढाते रहे
सारी अदालतों के फ़ैसलों के खिलाफ़
तथाकथित ईमानदारी पर मदमदाते रहे
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तुम्हारा तो मकसद ही हमेशा बिखेरना रहा है
और मेरी कोशिशें हमेशा सम्भलना रहा है
तुमने कभी कोई कमी नहीं रखी कहने और सुनाने में
मेरा तो स्वभाव ही सुनना, चुप रहना, सहना रहा है
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28/04/2011

मसखरों के बीच कैसे, उदासी बांटी जाए


मां तो सिर्फ़ औलाद पैदा करती है
इंसान और सिर्फ़ इंसानियत पैदा करती है
दुनियां ही देती है उन्हें मजहबी तमगे और जातियां
दुनियां ही दिलों में नफ़रत पैदा करती है
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सारे गम सह गए होते, अगर आंसू बह गए होते
उन्होंने रोका, टोका न होता..क्या क्या कह गए होते
बहुत मुश्किल थे सवालात इश्किया परचे के
जवाब आते होते तो हम भी पास हो गए होते
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मसखरों के बीच कैसे, उदासी बांटी जाए
दादुरों के बीच कैसे खामोशी बांटी जाए..
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सुबकते बच्चे को थपकियां दे सुलाया मैंने
प्यारभरी लोरी गा गुमशुदा नींद को बुलाया मैंने
अपने मन उजियाले सपनों का दीया जला
कलमुहीं रात को खूब चिढाया मैंने
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हाथ बंधा दीजिए, बेजुबां कीजिए
हस्ती मिटा दीजिए, ज़मींदोज कीजिए
एक दिन तो सच का मुतमुइन है 
चाहे जितनी दीवारें चुना दीजिए
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बेबस और लाचार होता जा रहा है
आदमी औज़ार होता जा रहा है
रिश्तों की कडवाहट और खुदगर्जी से 
घर भी अपना बाज़ार होता जा रहा है
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उडनेवालों को ज़मीन पर आना ही पडता है
अनंत महाविराट के सामने आखिर सर झुकाना ही पडता है
हिमालय से शिखर के साथ सागर की अतल गहराई भी है
औकात को अपनी औकात में आना ही पडता है




15/04/2011




सुबह से शाम सब के साथ खटते खटते
कितना थक जाता है दिन
इसीलिए यूं ही धाडी के मजूर मानिंद
बिना कहे-सुने चुपचाप ढल जाता है दिन

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कर न सका कुछ सिर्फ़ सोचता ही रह गया
एक जरा सी चूक से जीवन ही बदल गया
कोशिशें बहुत की मगर रोक न पाया
पल भर भी न ठहरा वो पल निकल गया
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नीचे के ईश्वर ऊपर के ईश्वरों से बडे हैं
इसीलिए तो सब उनकी सेवा में खडे हैं
जिस पर हो कृपा, करे वारे-न्यारे
जीवन नरक कर डाले जिस पर ये बिगडे हैं
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प्रेम के सारे फ़साने बदल डाले
आइने दिखाने वाले आइने बदल डाले
हमपेशा से ही करते हैं प्रेम, शादी
पेशेवरों ने प्रेम के माने बदल डाले

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एक जिद के लिए ज़िंदगी से ठान ली
एक जिद ने न जाने कितनी जिदें पहचान ली
एक जिद पूरी करने के लिए
एक जिद ने जान दी, एक जिद ने जान ली
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आंसुओं का अहसास
सिर्फ़ गाल करते हैं
लोग तो सिर्फ़ आंसुओं से
सवाल करते हैं
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दर्पण कभी झूठ नहीं बोलते
और हम कभी सच नहीं बोलते
देखते रहते हैं अपने ही मुखोटै
सच के नहीं कभी, चेहरे टटोलते

01/04/2011

रंगों की भाषा रंगबाज़ ही समझे



बागों के फ़ूल गमलों में ले आते हैं
बागों को ही अपने भवनों में ले आते हैं
कुछ लोग बहुत समझदार होते हैं
पेड वही लगाते हैं, जिन पर ढेरों फ़ल आते हैं
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यूं ही नहीं बहुत खास लिखे हैं
अल्फ़ाज़ नहीं दिल के अहसास लिखे हैं
जानते हैं तुम दूर हो हम से, बहुत दूर
फ़िर भी हमने अपने दिल के पास लिखे हैं
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सिर्फ़ देह नहीं जीवन की धूरी है स्त्री
अधूरा सिर्फ़ पुरुष, पूरी है स्त्री
स्त्री के हृदय में रमते हैं देव
करुणा,प्रेम, समर्पण, मजबूरी है स्त्री 
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खुद को कर आग के हवाले
हर चराग बांटता फ़िरता उजाले
पर नामुराद हवाएं कब समझेगी
उजालों को बचाते पड जाते हैं हाथों में छाले
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सब कुछ मिल जाता है जहां में
सिर्फ़ मुहब्बत को ही, मुहब्बत नहीं मिलती
हर फ़ूल लिए है खिलने, खुश्बू बिखेरने की चाह
पर बागवानों की रहमत और किस्मत नहीं मिलती
******* 

घर तो आखिर घर होता है
घर के बिना कहां गुज़र होता है
लोग आते-जाते रहते हैं घरों से
घर ताज़िंदगी हम सफ़र होता है
नाप ले पंछी कितने भी आसमां
लौटता है वहीं, जहां घर होता है
बदकिस्मत वे जिनके घर नहीं होते
घर, घर नहीं परिवार का मंदर होता है
*******

बेरंग भी एक रंग होता है
रंग को समझने का एक ढंग होता है
रंगों की भाषा रंगबाज़ ही समझे 
क्यूंकि रंग तो आखिर रंग होता है 


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