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20/11/2010

फ़ूलों की ताज़गी कब तलक
वक्त के साथ मुरझा जानी है
खुश्बुओं की भी एक उम्र है अपनी
उसके बाद सिर्फ़ हवा रह जानी हैं
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किस प्यार का गम, काहे का बहाना सनम
क्यूं किस्मत को कोसें क्यूं पालें कोई भरम
दिल तो होता ही है टूटने के लिए
क्यूं बार बार रोएं क्यूं गमजदां हों हम
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आंखों से बहते बहते अचानक
रुक गया पानी
किसी आंख के लिए
जैसे झुक गया पानी
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कितना मूर्ख है दोस्ती वफ़ा की बात करता है
इस ज़माने में उस ज़माने की बात करता है
दोस्ती और वफ़ाएं कहां है आजकल
महज वक्तगुज़ार(टाईमपास) सिलसिलें हैं आजकल
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लिखें वह जो पढे कोई
कहें वह जो सुनें कोई
क्या इतना काफ़ी नहीं होगा?
सन्नाटों को हराने के लिए
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दोस्ती दर्द से हमने कर ही ली आखिर
खा ही लिया सीने पर ये ज़हरबुझा तीर आखिर
देख लिए तुम्हारी चाहत के तमाम ज़लवे 
देखते हैं और क्या क्या दिखाती है तकदीर आखिर
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खयालों में ही खामख्वाह खयाल आया है
खयालों को भला कौन पकड पाया है
खयालों को गिरफ़्तार करने की बात करता है
लगता है यार! खयालों से ही मात खाया है
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