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05/12/2010

नहीं कोई दरख्त ही राह में
छांह कहां से लाऊं
धूप में झुलसना ही किस्मत है
झलता जाऊं..चलता जाऊं
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बिना पतवारों के किश्तियां
नहीं पहुंचती पार
किसी भी ऊंचाई पर पहुंचने के लिए
एक अदद सीढी की तो होती ही है दरकार
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इस मुलाकात का जवाब नहीं
मैं हूं, वो है, संवाद नहीं.
मैं कुछ भी न भूल पाया पर
उसे कुछ भी याद नहीं
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मज़ाक उनसे अच्छा, जो आपसे मज़ाक करे
मज़ाक करते वक्त लोग, अक्सर ये भूल जाते हैं
मज़ाक ही मज़ाक में हो जाता है क्या से क्या
जब गुजरती है खुद पर तब हम पछताते हैं
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कुछ लोग मज़ाक में हद भूल जाते हैं
खुद का और सामनेवाले का कद भूल जाते हैं
मज़ाक करनेवालों को मज़ाक सहना भी आना चाहिए
मज़ाक का ये सबसे बडा ऊसूल भूल जाते हैं
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ए खुदा जितना भी कर सके, कमाल कर
ज़िंदगी बदतर बदहाल कर
रखते हैं हुनर हम, हर हाल में जीने का
तू चाहे जितना, आकाश पाताल कर.
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ज़िंदगी इतनी आसान नहीं होती
अपने हाथ इसकी कमान नहीं होती
हम सब कठपुतलियां अपने अपने समय की
हमारे बस हमारी जान नहीं होती
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